पंडित भातखंडे जी ने जो बंदिशों की रचना की उसके बारे में अण्णासाहब रातंजनकर जी के शिष्य पंडित प्रभाकर नारायण चिंचोरे लिखते हैं--
“गीत रचना की दिशा में रावसाहब पंडित भातखंडे जी ने जो कुछ किया है, वह भी उनके बहुमुखी संगीत सेवा का एक सुदृढ़ स्तंभ है। नए-नए गीत रच कर सदारंग- अदारंग पर मात करना उनका उद्देश्य नहीं था। जिन रागों में परंपरागत गीतों के उत्तम उत्तम नमूने मौजूद है, वहां पर अपनी शक्ति का अपव्यय उन्होंने नहीं होने दिया। स्थाई के एक दो टुकड़ों में मृतवत पड़े हुए रागों में नवीन गीत रचना कर उनमें प्राण फूंक दिए, उनके गुणों का संपूर्ण विकास कर उन्हें पुनः राग कहलाने योग्य बना दिया। जिन गीतों के स्वरकरण पर वे आकर्षित हुए, परंतु शब्द रचना निम्न कोटि की प्रतीत हुई, वहां पर उन्होंने नवीन शब्द योजना की अथवा जुगलबंदी का प्रयास किया।
सैकड़ो लक्षण गीतों की रचना ही संगीत की एक अन्य विस्मृत परंपरा को पुनर्जीवित करने का तथा अपने संगीत सिद्धांत पेशेवर गायक वादकों एवं सभी संगीत शिक्षार्थियों तक पहुंचाने का उनका सहज, सुलभ और प्रभावशाली प्रयास था।”
उन्होंने रचना की हुई अनेक बंदिशें क्रमिक पुस्तक मालिका के भागों में समाविष्ट की है। मगर जिन बन्दिशोंका समावेश क्रमिक पुस्तक मालिका में नहीं हुआ, ऐसे 68 बन्दिशोंका संकलन भातखण्डे स्मृति ग्रंथमे किया है। उन बन्दिशोंके गीतके बोल और नोटेशन भातखण्डे स्मृति ग्रंथसे उद्घृत किया है।