मारिस कॉलेज और भातखंडे संगीत विद्यापीठकी स्थापना

करीब करीब 1916-17 मे अण्णासाहब के मन में एक संगीत विद्यालय शुरू करने की योजना आयी। दूसरी अखिल भारतीय संगीत परिषद सन 1918 में हुई। उपस्थित गुरुजनों की इच्छा होने के कारण हिंदुस्तानी संगीत की एक केंद्रीय संस्था दिल्ली में स्थापित करने का प्रस्ताव इस परिषद में पहली बार रखा गया। उस परिषद में, परिषद के अध्यक्ष रामपुर के नवाब का, इस संस्था के लिए पर्याप्त द्रव्य सहायता देने का विचार था। मगर कुछ अनिवार्य अडचनों के कारण यह विचार सफल न हो पाया।

सन 1919 दिसंबर में तीसरी अखिल भारतीय संगीत परिषद बनारस में हुई। मध्यवर्ती हिंदुस्तानी संगीत की संस्था दिल्ली में स्थापित करने का प्रस्ताव इस परिषद में भी रखा गया; मगर वह पारित हो न सका। लखनऊ पास के दरियाबाद के तालुक राय उमानाथ बली ने लखनऊ में एक मध्यवर्ती संगीत संस्था स्थापित करनेकी की योजना तैयार की। उन्होंने अण्णासाहब के साथ संस्था का निर्माण करने के बारेमे चर्चा की और अण्णासाहेब ने उस योजना को सम्मति दी। सहयोग से उस वर्ष लखनऊ का शासकीय विभाग भी लखनऊ में संगीत परिषद बुलाने की योजना के लिए अनुकूल था। उत्तर प्रदेश के तत्कालीन गवर्नर सर विलियम मारिस संस्कृत साहित्य तथा कला के प्रति सहानुभूति रखते थे; तथा दरियाबाद के डॉक्टर राय राजेश्वर बली संयुक्त मध्य प्रदेश के शिक्षा मंत्री थे।

दिसंबर 1924 की लखनऊ संगीत परिषद में लखनऊ में संगीत शिक्षण संस्था खोलने के लिए पर्याप्त धन इकट्ठा नहीं हो पाया था। दिसंबर 1925 में लखनऊ में हुए अखिल भारतीय संगीत परिषद के पांचवे अधिवेशन में संगीत विद्यालय संबंधी प्रस्ताव का स्वागत हुआ और काफी धन भी इकट्ठा हो गया।

1926 की जुलाई में लखनऊ के कैसरबाग के पास तोप वाली कोठी में हिंदुस्तानी रागदारी संगीत की कक्षाएं खुल गई। 16 सितंबर 1926 को उसका नामकरण “ दि मारिस कॉलेज ऑफ़ म्यूजिक ” हुआ और कैसरबाग बरादरी हॉल में क्लासेस शुरू हुए। 26 मार्च 1968 में यह कॉलेज उत्तर प्रदेश गव्हर्नमेँट के अधिपत्य में आया और उसका नाम “ भातखंडे कॉलेज ऑफ़ हिंदुस्तानी म्यूजिक ” रखा गया। सन 2020 में भातखंडे कॉलेज ऑफ़ हिंदुस्तानी म्यूजिक को डीम्ड यूनिवर्सिटी का दर्जा दिया गया। सन 2022 में इसका नाम “ भातखंडे संस्कृति विश्वविद्यालय ” ऐसा रखा गया और अब उसमें विविध कला शाखाओं की शिक्षा दी जाती है।

सुश्री सुशीला मिस्राजी ने मारिस कॉलेज से बैचलर्स डिग्री इन म्यूजिक पास की थी और उन्हें आचार्य रातंजनकर, पंडित गोविंद नारायण नातू और अन्य गुरुओं से तालीम मिली थी। मारिस कॉलेज के साथ घनिष्ठ संबंध होने के कारण उन्होंने “Music Makers of The Bhatkhande College of Hindustani Music” इस नाम की किताब लिखी। यह किताब 1985 में संगीत रिसर्च अकैडमी, कोलकता, ने प्रकाशित की थी। इस किताब में मारिस कॉलेज के गठन का इतिहास, स्थापना काल में कॉलेज से जुड़े हुए संगीतशास्त्रीओं का, पढानेवाले गुरु और पढ़ने वाले प्रमुख शिष्यों की जानकारी दी है। किताबकी PDF कॉपी इस विभागमे शामिल की गयी है।

भातखंडे संगीत विद्यापीठ हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत शिक्षा का प्रमाणीकरण (स्टैंडर्डायझेशन) करने के उद्देश्य से पंडित वि ना भातखंडे और राय उमानाथ बली के प्रयत्नों से सन 1926 में एक संस्था का गठन किया गया। "भातखंडे यूनिवर्सिटी ऑफ़ इंडियन म्यूजिक सोसायटी" इस नाम से सन 1939 में उसका रजिस्ट्रेशन किया गया। पंडित भातखंडे जी की जन्म शताब्दी के अवसर पर 1948 में उस संस्था का "भातखंडे संगीत विद्यापीठ" ऐसा नामकरण किया गया। गायन, वाद्यसंगीत और नृत्य इन तीन विद्याशाखाओं में प्रमाणित किताबों का निर्माण और प्रथमा, मध्यमा, विशारद, निपुण और आचार्य इन छे स्तरों मे 8 से 10 वर्षों का कोर्स डिझाइन किया गया। पूरे भारत में अनेक शहरोंमें विविध शिक्षा संस्थाओंमे इन कोर्सेस के लिए परीक्षाएं नियमित रूप से संचालित की जाती है।

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Music Makers of The Bhatkhande College of Hindustani Music