भारत भ्रमण और यात्राओंकी डायरीओंका संक्षेपमें वर्णन

पंडित भातखंडे जी ने जो समस्त भारत की ४ यात्राएँ की उनके उद्देश्य के बारेमें भातखण्डे स्मृतिग्रंथमे आचार्य रातंजनकर जी लिखते हैं --

“संगीत का क्रियात्मक एवं शास्त्रीय अभ्यास करने के पश्चात भी उनका (पंडित भातखंडे जी का) समाधान न हुआ। तब उन्होंने संगीत शास्त्र के अनुसंधान की दृष्टि से समस्त भारत की यात्रा की।

उन्होंने पहले पश्चिम में गुजरात, काठियावाड़ की यात्रा की। सूरत, बडौदा, भरूच, नवसारी, अहमदाबाद, राजकोट, बीकानेर, जामनगर, जूनागढ़, भावनगर आदि शहरों में हो आए। ***

तत्पश्चात दूसरी यात्रा सन 1904 में दक्षिण की हुई; जिसमें मद्रास, मैसूर, तंजौर, मदुरा, त्रिवेंद्रम, इटैयापुरम, रामेश्वर, बैंगलोर आदि शहरों में जाकर वहां संगीतद्न्य विद्वानों के साथ संगीत पर चर्चा की। दक्षिण संगीत प्रणाली का उस समय का शुद्ध-स्वर-मेल तथा उस प्रणाली का पर्याप्त ज्ञान प्राप्त किया। विशेषतया इटैयापुरम में भी श्री सुब्रमण्य उपनाम सुब्राम दीक्षित से उनको पंडित व्यंकटमखी की मेल प्रक्रिया का एवं तत्कालीन दाक्षिणात्य संगीत प्रणाली का स्पष्टीकरण प्राप्त हुआ। व्यंकटमखी की चतुर्दंडिप्रकाशिका का हस्तलेख भी उनको यहीं से प्राप्त हुआ। इसके अतिरिक्त कुछ ग्रंथ, जैसे रामामात्य का स्वर-मेल-कलानिधि, तंजौर के तुलाजीराव भोंसले का लिखा हुआ संगीत-सारामृतोद्धार, रागलक्षणम् इत्यादि हस्तलिखित ग्रंथ तंजौर, मैसूर, मद्रास के पुस्तकालयों से प्राप्त किए और जिन्हें बाद में प्रकाशित भी किया। @@@

(पंडित भातखंडे जी) कराची में वकालत करते थे, तब एकाद बार हैदराबाद, सिंध, शिकारपुर, लाहौर तथा कच्छ हो आए थे। ***

सन 1907 में अण्णासाहब ने पूर्व की यात्रा की। इस यात्रा में वे कोलकता, जगन्नाथ पुरी, विजयानगरम तथा दख्खन हैदराबाद गए थे। कोलकता में स्वर्गीय राजा सौरीन्द्र मोहन टैगोर से भेंट हुई। अण्णासाहब के संगीत विषयक विचार एवं प्रयत्नोंपर राजा साहब बहुत प्रसन्न हुए। दोनों का स्नेह संबंध दृढ़ हुआ। दोनों ने एक दूसरे के प्रयत्नों में सहायता देने का निश्चय किया। इन दोनोंका पत्र व्यवहार राजा साहब के जीवनभर चलता रहा। और भी कई संगीत प्रेमी तथा संगीत व्यवसाय सज्जनों से अण्णासाहब की भेंट एवं संगीत चर्चा हुई। वहां के गायक-वादक गुनीजनों के कार्यक्रम सुने।

पूर्व भारत की यात्रा करके थोड़े ही महीनों के पश्चात अण्णासाहब उत्तर भारत की यात्रा पर चल पड़े। इस यात्रा में वे जबलपुर, इलाहाबाद, बनारस, गया, मथुरा, आगरा, लखनऊ, दिल्ली, जयपुर, बीकानेर, जोधपुर और उदयपुर हो आए। इलाहाबाद में स्वर्गीय पंडित श्रीकृष्ण जोशी से परिचय हुआ, जो उस समय एक बड़े सहकारी ओहद पर कार्य कर रहे थे और रागदारी संगीत के निस्सीम भक्त थे। यह परिचय प्रीतम लाल गुसाई नामक एक संगीत के विद्वान के यहां हुआ। गुसाईजी के यहां, संगीत पर जो चर्चा, जो प्रश्नोत्तर हुए वह सब उक्त जोशीजी की उपस्थिति में हुए। प्रीतम लाल जी से पूछे हुए प्रश्नों से, एवं उन प्रश्नों पर हुई दोनों की चर्चा से श्री जोशीजी को अण्णासाहब के संगीत क्षेत्र में किए हुए परिश्रम की पूर्ण कल्पना हुई और उन्होंने अपने यहां उनको निमंत्रण दिया। जोशीजी के यहां भी खूब चर्चा हुई। जोशी जी स्वयं एक सुशिक्षित विद्वान एवं अनुभवी पुरुष थे। अण्णासाहब ने प्रचलित रागदारी संगीत का रूप, उस पर एक शास्त्र ग्रंथ निर्माण करने की आवश्यकता और इसी दिशा में अपने किए हुए प्रयत्न, पुराने शास्त्र-ग्रंथोंका निजी अध्ययन, परंपरागत रागदारी गीतों का संग्रह जो कि इस नये शास्त्रग्रंथ के लिए मुख्य आधार था- इन सब बातों पर अपने विचार, संगीत पर अनुसंधान संबंधी यात्राओं का उद्देश्य इत्यादि जोशी जी को समझाया। अपने रचे हुए लक्षण गीत भी सुनाए। जोशी जी को यह सब सुनकर इतना पसंद आया कि वे अण्णासाहब के एक परम मित्र बन गए। दरभंगा के लोचन कवि की राग-तरंगिणी अण्णासाहब को इन्हीं जोशी जी के प्रयत्नों से प्राप्त हुई। इलाहाबाद, मथुरा तथा दिल्ली में अण्णासाहब को कुछ संगीत विद्वानों के बड़े विचित्र एवं मनोरंजक अनुभव हुए। ग्रंथ वाक्य का अर्थ जैसा कुछ समझ में आया अपनी मनगढ़ंत व्याख्या उसपर लादकर जो संगीत शास्त्र की इमारतें खड़ी की गई थी, वे उन्होंने देखी। उनके साथ खूब चर्चा करके उनकी दिशाभूल कहां- किस प्रकार हो रही थी, वह अण्णासाहब ने उन्हें समझाया। इस यात्रा में बड़े-बड़े गुणी गायकों के गायन वादन प्रयोग भी सुने। उन गायकों के साथ राग-रूपों पर चर्चा की। उदयपुर में उस्ताद जाकिरुद्दीन खाँ तथा उनके भाई अल्लाबंदे खाँ का आलाप गान खूब जी भर सुना।

इस प्रकार ग्रन्थों का अध्ययन, क्रियात्मक संगीत की शिक्षा एवं अभ्यास तथा संगीत संशोधनार्थ भारत भर की यात्राएं समाप्त करके अण्णासाहब ने सन 1909 में अपने चिरस्मरणीय संगीत ग्रंथ लिखना आरंभ किया।“

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दक्षिण, पूर्व और उत्तरभारत की यात्राओंमे पंडित भातखण्डेजी किन विद्वानोंसे मिले और उनके साथ जो चर्चा हुई इसका ब्यौरा संगीत पद्धति - मराठी (संगीत शास्त्र- हिंदी) इन किताबोंमे जगह जगह पर दिया है।

@@@ “मेरी दक्षिण भारत की संगीत यात्रा”- इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़, छत्तीसगढ़.- इस ग्रन्थ की मुद्रित प्रति उपलब्ध है; तथा उसकी PDF कॉपी उपलब्ध है जिसकी लिंक नीचे दी हुई है।

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मेरी दक्षिण की यात्रा
*** पंडितजी ने की हुई सिंध- कराची की यात्रा, तथा पश्चिम भारत की यात्राओं के बारेमें कुछ भी जानकारी उपलब्ध नहीं हुई।